सुखलाल और मैं

Shehnaz (shehnaz@apu.edu.in)

मैं करीब डेढ़ साल से छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल क्षेत्र दंतेवाड़ा के सरकारी स्कूलों में काम कर रही हूँ| वैसे तो मैं मुख्यतः माध्यमिक स्कूलों के शिक्षकों और बच्चों के साथ काम करती हूँ परन्तु जब कभी भी मुझे माध्यमिक स्कूल से थोड़ा समय मिलता है तो मैं अपने माध्यमिक विद्यालय के एकदम समीप स्थित प्राथमिक विद्यालय के बच्चों के साथ कुछ गतिविधियाँ करने उनके स्कूल में चली जाती हूँ|

वैसे तो मैं मानती हूँ कि प्रत्येक बच्चा अपने आप में अनोखा होता है लेकिन फिर भी मैंने बच्चों के साथ काम करने के अपने अभी तक के अनुभव के आधार पर पाया कि मुझे जाने क्यों कुछ बच्चे अन्य बच्चों की तुलना में कुछ ज़्यादा ही आकर्षित करते हैं| ऐसा ही एक बच्चा है प्राथमिक स्कूल में कक्षा एक में पढ़ने वाला सुखलाल| मैं जब भी इस बच्चे की कक्षा में जाती हूँ तो वो मुझे वापस नहीं आने देता| सुखलाल हमेशा काफ़ी खुश रहता है और उसे जैसी एक धुन सी रहती है लिख कर चेक कराने की| कभी-कभी तो मुझे उसे लेकर चिंता भी होती है कि कहीं वो अपने किये हुए काम को एक वयस्क व्यक्ति से अप्रूव कराने का आदी न हो जाए| इसीलिए जब भी मैं उसे उसकी कॉपी कर उसका नाम लिख कर देती हूँ तो कोशिश यही करती हूँ कि वह खुद अपने लिखे हुए को जांचे| शुरुआत में सुखलाल अपने नाम के सभी अक्षर उलटे लिखता था परन्तु अब वो अपने नाम के सीधे अक्षर लिखना सीख गया है| सुखलाल को ऐसा लगता है कि मैं उससे अधिक जानती हूँ और उसे सिखाऊँगी| तो कक्षा के भीतर कुछ ऐसा होता है सुखलाल- छोटी छोटी चीज़ों के लिए मानो मुझपर आश्रित सा महसूस करता हुआ| कभी-कभी जब मैं माध्यमिक स्कूल में होती हूँ तो वो अपने स्कूल से माध्यमिक स्कूल तक अपनी कॉपी के साथ आ जाता है| और मुझसे कहता है, “मैम चेक कर दो|”

Sukhlal
Illustration by Swetha (swetha@apu.edu.in)

लेकिन बच्चों के साथ हमारा काम सिर्फ कक्षा के भीतर तक ही सीमित नहीं होता| हमें प्रत्येक बच्चे को समझने के लिए उसके साथ थोड़ा समय बिताना होता है| और उनके साथ कक्षा के बाहर समय बिताने के दौरान ही कुछ ऐसा होता है जो हमारे चेहरे पर मुस्कान ला देता है| ऐसा ही कुछ अनुभव मेरे साथ भी हुआ| एक बार मेरी माध्यमिक शाला के एक बच्चे के पैर में चोट लगने की वजह से काफी सूजन हो गयी| जड़ी-बूटियों के उपचार के बावजूद भी घाव भरने का नाम नहीं ले रहा था| मैंने यह ज़रूरी समझा कि एक बार बच्चे के माता-पिता से मिलकर उसे अस्पताल ले जाने के बारे में चर्चा करनी चाहिए| मुझे बच्चे का घर पता नहीं था तो मैंने उसके घर के पास रहने वाले कुछ बच्चों से बात की कि हम लंच के समय उसके घर जायेंगे| इन कुछ बच्चों के समूह में सुखलाल न शामिल हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता था| वह खुद ब खुद बोला कि मैं भी चलूँगा मैम| तो इस प्रकार पांच बच्चों के साथ मैं उस बच्चे के घर चल पड़ी| इन पांच बच्चों में तीन सातवीं कक्षा के और दो प्राथमिक कक्षा के थे, उनमें से एक सुखलाल था| जिस रास्ते से होकर मुझे उस बच्चे के घर पहुंचना था वहां बीच में एक छोटा सा नाला था| बारिश का मौसम होने के कारण उस समय वह भरा हुआ था| अन्य बच्चे तो पहले ही इसे पार कर गये| सुखलाल मेरे एकदम आगे-आगे चल रहा था| नाले का पानी देखते ही मेरे मुँह से अनायास ही निकल गया, “अरे मैं तो इसे पार ही नहीं कर पाऊँगी|” यह सुनकर सुखलाल तुरंत बोला, “नहीं ले जायेगा मैम|” यह कहकर फ़टाफ़ट पूरा नाला पार करके उस पार खड़ा हो गया, मानो मुझे आश्वस्त करने के लिए दिखा रहा हो कि देखो ऐसे पार किया जाता है| मैं धीरे-धीरे चलने लगी और वह उस पर से मुझे देखता रहा, तब तक जब तक मैंने पूरा नाला पार नहीं कर लिया| इसके बाद रस्ते में एक और चीज़ आई जहाँ सुखलाल को खुद को मुझसे सुपीरियर साबित करने का मौका मिल गया| इस बार रास्ते में एक गड्ढा आया| ये गड्ढा इतना तो गहरा था कि इसे कूदकर ही पार किया जा सकता था| सुखलाल ने कूदकर इस गड्ढे को पार किया और वापस मुड़कर मुझे देखने लगा, मानो यह सुनिश्चित कर रहा हो कि कहीं मैं गड्ढा पार कर भी पाऊँगी या नहीं| मैंने उससे कहा, “देखो कर लिया मैंने पार, तुम्हें क्या लगा मैं नहीं कर पाऊँगी?|” यह सुनकर वह मुस्कुरा दिया| अब तक हम बच्चे के घर पहुँच चुके थे और चूंकि मुझे हल्बी(दंतेवाड़ा की क्षेत्रीय भाषा) नहीं आती थी तो मेरे साथ गए हुए माध्यमिक स्कूल के बच्चों ने ही बच्चे के माता-पिता से बात की और उनके कहा कि वे उसे लेकर अस्पताल जायें|

अब हमने वापस लौटना शुरू किया| एक बार फिर से हमें गड्ढा और पानी से भरा हुआ नाला पार करना था| सुखलाल पहले की तरह अभी भी मेरे आगे-आगे ही चल रहा था| इस बार रास्ते में जब फिर से नाला आया तो फटाफट उसे पार करके दूसरी ओर पहुंचकर वह हँसते हुए ज़ोर-ज़ोर से बोला, “ले जायेगा मैम, ले जायेगा|” मैंने कहा, “कोई बात नहीं, ले जाने दो| तुम तो हो ही मुझे बचाने के लिए|” यह सुनकर वह मुस्कुरा दिया| नदी पार करने के बाद वह मुझसे आसपास लगे हुए पेड़ों के नाम पूछने लगा, जैसे मन ही मन कह रहा हो, “हां कक्षा में तो बहुत परीक्षा लेती हो, अब बोलो?” उसे उन सभी पौधों के नाम पहले से ही पता थे और मुझे एक का भी नाम नहीं मालूम था|

मैं कह सकती हूँ कि शायद सुखलाल को उस दिन यह बात समझ में आई हो कि मैं सर्वगुण संपन्न या सर्वज्ञानी नहीं हूँ| ऐसे बहुत से काम होंगें जिन्हें शायद वह मुझसे बेहतर ढंग से कर पायेगा| शायद वह समझ सका हो कि यदि कुछ बातों के लिए वह मुझ पर आश्रित महसूस करता है तो मैं भी कई बातों के लिए बच्चों पर आश्रित रहती हूँ| चाहे वह किसी बच्चे के घर का रास्ता बताना हो, क्षेत्रीय भाषा में बच्चों के माता-पिता से बात करनी हो या स्थानीय पेड़-पौधों के नाम बताने हों, बहुत सारी बातें हैं जिनमें वे मेरी मदद करते हैं|

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